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अलीगढ़आस्था

दारा शिकोह की विचारधारा गंगा-जमुनी तहजीब की असली बुनियाद : प्रोफेसर तारिक मंसूर

अलीगढ़। सम्वाददाता::

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के सुल्तान जहां मंजिल स्थित कॉन्फ्रेंस हॉल में डॉ. मोहम्मद फारूक की नई पुस्तक “दारा शिकोह: जीवन, दर्शन और रचनाएं” का भव्य विमोचन संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य (MLC) और AMU के पूर्व कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर ने पुस्तक का लोकार्पण करते हुए दारा शिकोह को अंतर्धार्मिक संवाद (Interfaith Dialogue) का अग्रदूत बताया।

​मुख्य बिंदु:

​बहुआयामी व्यक्तित्व: प्रोफेसर तारिक मंसूर ने कहा कि दारा शिकोह केवल एक विचारक ही नहीं, बल्कि एक कुशल वास्तुकार और मानवतावादी भी थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदुस्तान और विश्व पटल पर विभिन्न धर्मों के बीच संवाद की पहली सार्थक पहल दारा शिकोह ने ही की थी।

​सामंजस्य पर जोर: अपने संबोधन में प्रोफेसर मंसूर ने समावेशी विकास की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा, “जब तक समाज बहुसंख्यक समुदाय के साथ पूर्ण सामंजस्य बनाकर नहीं चलेगा, तब तक सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।”

​प्रासंगिकता: सेवानिवृत्त प्रोफेसर रज़ा उल्लाह खान ने कहा कि दारा शिकोह की विचारधारा वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने गंगा-जमुनी तहजीब को भारत की असली पहचान बताते हुए इसे विभाजनकारी शक्तियों के खिलाफ मजबूत करने का आह्वान किया।

पुस्तक के लेखक डॉ. मोहम्मद फारूक खान ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि दारा शिकोह एक विचारधारा हैं जो दिलों को जोड़ती है। उन्होंने कहा, “उनकी रचनाएं उपनिषदों और सूफीवाद के बीच का सेतु हैं। मेरा उद्देश्य ‘मजमा-उल-बहरीन’ (दो समुद्रों के मिलन) के संदेश को जन-जन तक पहुँचाना है।”

​विशिष्ट उपस्थिति:

कार्यक्रम के दौरान नितिन भटनागर ने लेखक का भव्य स्वागत किया। मंच पर पूर्व प्रॉक्टर प्रोफेसर वसीम अली और तिब्बिया कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. अब्दुल हक भी मौजूद रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. फैजान इलाही द्वारा किया गया।

​इस अवसर पर प्रोफेसर मोहम्मद अली जौहर, राशिद मुस्तफा, असद यार खान, इश्तियाक अहमद और शकील अहमद समेत बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के शिक्षाविद, छात्र और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने इस पुस्तक को सामाजिक समरसता की दिशा में एक ‘विचारोत्तेजक और सार्थक पहल’ करार दिया।

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